सोमवार, 3 दिसंबर 2012

धरती पर देव कार्यालय



Rahul Tripathi
Mo-9305029350


ष्ट की काली रातें असीम सुख के पलों को खामोश कर देती हैं, सत्यता यही है कि बुरे दिनों से लड़ना ही उनसे पीछा छुड़ाने का सबसे प्रबल हथियार है बस जरूरत है ईश्वर की असीम शक्ती उनका साथ दे।
तन को गुनगुनी गर्माहट देने वाली सूर्य की किरणें दूर गगन में शमां चुकी थीं, सड़कों, चैराहों पर वाहन स्ट्रीट की रोशनी में दौड़ रहे थे। वहीं सड़क के किनारे चमचमाती एक हाॅस्पिटल में गहमागमी थी वहां लोगों को जल्दी थी लेकिन सबसे अलग। रोशनी से जगमग हाॅस्पिटल तीमारदारों के चेहरे पर दुख के क्षणों की दृश्यता स्पष्ट झलक रही थी। तीमारदार खामोशी से मरीज के इर्द-गिर्द घूमकर साहस का प्रदर्शन कर थे। कुछ मरीजों के कुनबे छुट्टी के बाद खुशी के पलों फुलझडि़यों का बखान कर नही थक रहे थे, वहीं कुछ अभागे मरीज की लंबी उम्र की प्रर्थना। जिन तीमारदारों के मरीजों को आॅपरेशन चल रहा था उनके हृदय मानों बैठा जा रहा हो, क्या होगा-क्या नही उनकी स्थित का अंदाजा ईश्वर ही लगा पा रहा होगा, हाॅ कई लोग ऐसे लोगों को भांति-भांति से ढ़ाढस बधाने की कोशिश कर रहा था फिर किसी के कुछ समझ में नही आ रहा था। पूरे परिसर का माहौल शांत लेकिन भय रूपी पीड़ा का महसूस हो रहा था। डाॅक्टर, तीमारदारों के मोबाइल धुनों कानों को तीखी लग रही थीं, बस खुश वहां के सिस्टर और वार्ड बाॅय थे, जिनकी हंसी-ठिठोली मानों नमक में चीनी मिलाने का काम कर रही हों। हाॅस्पिटल में मौजूद सभी लोगों का दिमाग शायद खुशियों में दुखों के अतिक्रमण पर मनन करने में लगा हुआ था।
जनरल वार्ड में स्थित ईश्वरीय लीला का कुरूपता प्रदर्शित कर रहा थी। लंबी-लंबी पलंगों के लाइनें मानों पूरी दुनिया के लोग बीमारी से जूझ रहे हों। मरीजों की स्थित जो भी हो लेकिन स्वस्थ तीमारदार के लिये वह जगह किसी सजा से कम नही दिख रही थी। पलंगों के ऊपर मरीज, बगल में दवा, समान और पलंग के नीचे लेटे तीमारदार। कोई मरीज बैठा, कोई लेटा, तो कोई जीने के लिय अन्न-फल ग्रहण करता, वहीं कुछ मरीज शांत दिख रहे थे। कुछ एक मरीजों के पीड़ा कानों में जाकर हृदय को झकझोर रही थी।
सफेद पट्टियों से बंधा एक मरीज पास ही था बिल्कुल शांत, उसके परिजनों में माॅ, पिता, भाई, उसकी पत्नी और दुधमुहा बेटा। माॅ और भाई उसका बेटा पलंग के नीचे लेटे थे जबकि पत्नी पैरों के करीब बैठी हुई थी, पिता नीचे चाय लेने गया था। दो दिनों से मरीज की सांसे ही चल रही थीं, नली के रास्ते उसे द्रव दिये जा रहे थे, लेकिन जीवन ज्योति की आशा से परिजन उसके इलाज में लगे थे। ग्लूकोज की बोतल लगी थी, संशकित पत्नी ने शांत पति को हिलाया। चूंकि कई दिनों से हालत नाजुक थी इस लिये वह पुनः यथास्थान पर आकर बैठ कर सोचने लगी। मुझे नही मालूम उसे क्या अहसास हुआ ..........................
अचानक अभागी चित्कारे मार-मार कर रोने लगी। मेरे रोगटे खडे़ हो रहे थे। आस-पास तीमारदारों का जमावड़ा लग रहा था जबकि सिस्टर और वार्ड जल्दी में पलंग के ओर आ रहे थे।
आक्सीजन और डाक्टरों के दल उसके पास आ चुके थे जबकि सिस्टर परिजनों और उसकी पत्नी को तसल्ली बंधा रहे थे।
    विचारा कई दिनों से जूझ रहा था, दिन में तीन चार बार पट्टी होती थी, पेट में पस पड़ गया था, भगवान को यही मंजूर था वहां खड़े लोग ऐसी चर्चायें करने लगे।
    एक एक कर डाक्टर मरीज से दूर जा रहे थे बस एक सिस्टर ही करीब खड़ी थी। तभी पिता हांफता आता है, क्या हुआ.. डाक्टर साहेब ? और चक्कर खाकर वहीं जमीन पर गिर गया। भाई के आंसू भी झलक आये थे जबकि मा और पत्नी पीड़ा अनंत दरिया में थीं। तभी एक वार्ड बाय आता है और कहता है कि डाक्टर साहब ने कहा है कि नीचे पर्चा बनवा लो चलकर...

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें